धर्म का सवाल मूल रूप से व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध का प्रश्न है ! व्यष्टि और समष्टि के बीच द्वन्द्व चलता ही रहता है और इस द्वन्द्व में धर्म का मूल तत्त्व भी बार-बार आच्छादित हो जाता है ! धर्म का मूल तत्त्व समन्वय है, सामंजस्य है , सहिष्णुता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सामाजिकमन में स्थायीभाव [सत्य-अहिंसा -दया आदि ] का आधान करने वाली प्रक्रिया, धर्म है । समाज ही धर्म का विधान करते हुए विनय,समर्पण , उदारता , दान , अपरिग्रह , सत्य , प्रेम ,अहिंसा , आर्जव , समता , संतोष आदि को चित्त में प्रतिष्ठित करता है !
गीता कहती है > अद्वेष्टा सर्वभूतानां = किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष-भाव न हो ! मैत्र: करुण एव च = द्वेष न होना ही काफी नहीं है , सभी के प्रति मैत्रीभाव हो और निर्बल के प्रति दया हो ! निर्ममो – निरहंकार:= मेरा पन न हो, अभिमान भी न हो ! समदु:ख:सुखक्षमी = सुखदुख में समान क्षमता से युक्त हो ! यस्मान्नोद्विजते लोको = जिससे लोक को उद्विग्नता न हो । लोकान्नोद्विजते च य: = उसे स्वयं भी लोक से उद्वेग न हो। सम: शत्रौ च मित्रेषु तथा मानापमानयो: = मान हो या अपमान ,शत्रु हो या मित्र समान दृष्टि वाला हो ~! ये समस्त गुण अथवा भाव समष्टि-भाव की प्रतिष्ठा करने वाले हैं !
सत्यान्नास्ति परो धर्म: ! अहिंसा परमोधर्म: ! परहित सरिस धरम नहि भाई ! समन्वय धर्म है ,समता धर्म है , न्याय धर्म है , क्षमा धर्म है । परोपकार धर्म है , सत्य धर्म है ,दया धर्म है ! अपरिग्रह धर्म है !सामाजिकता धर्म है ! ईमानदारी धर्म है । कर्तव्यनिष्ठा धर्म है ! प्रेम धर्म है, विनय धर्म है , कृतज्ञता धर्म है ! निरभिमान होना धर्म है ! मनुष्यता धर्म है ! व्यक्तिजीवन और सामाजिकजीवन का समन्वय करके उत्कर्ष-उन्नयन करना धर्म है !

भागवत में ही प्रसंग है कि नारद जब युधिष्ठिर को प्रह्लाद का चरित्र सुनाते हैं ,तभी युधिष्ठिर नारद से प्रश्न करते हैं कि >> हे देवर्षि ! मैं सनातनधर्म का स्वरूप जानना चाहता हूं । तब नारद युधिष्ठिर को सनातनधर्म का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि, “सत्य धर्म है, दया धर्म है, तप धर्म है, पवित्रता धर्म है, सहनशीलता धर्म है, उचित-अनुचित का विचार धर्म है, मन का संयम और इन्द्रियों का दमन धर्म है, अहिंसा और ब्रह्मचर्य धर्म है, त्याग-स्वाध्याय-सरलता और संतोष धर्म हैं । सबको समान भाव से देखना और समान भाव से व्यवहार करना धर्म है, सेवा धर्म है , धीरे-धीरे भोग-प्रवृत्ति से उबरना धर्म है , विनय [अभिमान न करना] धर्म है , मौन धर्म है ,आत्मचिन्तन धर्म है , जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं >>अन्न आदि का यथायोग्य विभाजन धर्म है, सभी में देव-भाव रखना धर्म है >> सीयराम मय सब जग जानी !

भगवंछ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्म सनातनम्‌। वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायण-मुखाच्छ्रुतम्‌ ।
सत्यं दया तपं शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:। अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्‌ !
संतोष: समदृक्सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:। नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्‌ !
अन्नाद्यादे: संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत: ।तेष्वात्मदेवता बुद्धि:सुतरां नृषु पांडव:।

  • भागवत ११ – ८-११

धर्म का भाव समष्टि का भाव है और बुद्ध ने समष्टिभाव को किस प्रकार से जगाया यह समझने की बात है ! भगवान बुद्ध उस समय बेलुवन में विहार कर रहे थे । एक गृहस्थ ने स्नान किया और उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम-ऊपर और नीचे की छह दिशाओं को प्रणाम किया । भगवान बुद्ध ने उससे इसका तात्पर्य पूछा तो उसने कहा कि मेरे पिताजी ने छह दिशाओं को नमस्कार करने का उपदेश किया था । भगवान बुद्ध ने कहा कि यह तो आर्यधर्म नहीं है । गृहस्थ ने कहा तो आप मुझे छह दिशाओं को नमस्कार करने वाले आर्यधर्म का उपदेश करिये । भगवान बुद्ध ने उपदेश किया >> माता-पिता पूर्व-दिशा हैं । आचार्य दक्षिणदिशा हैं । पत्नी और पुत्र पश्चिमदिशा हैं ।मित्र और साथी उत्तरदिशा हैं । भृत्य और कर्मकर नीचे की दिशा हैं तथा ब्राह्मण और श्रमण ऊपर की दिशा हैं । इनके प्रति अपने दायित्व को निभाना ही छह दिशाओं को नमस्कार है ,यह आर्य धर्म है ।

बुद्ध ने बार-बार कहा कि >>
चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ,लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं । देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मंझे कल्याणं- परियोसान कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ। [महावग्ग: : विनयपिटक]

भिक्षुओ, बहुजनसुख के लिये, बहुजन हित के लिये , लोगों को सुख पंहुचाने के लिये निरन्तर भ्रमण करते रहो । आदि-मध्य-और अन्त सभी अवस्थाओं के लिये कल्याणमय धर्म का भाव और आचरण- सहित प्रकाश करते रहो !”
परस्परोपग्रहो जीवानां!! का उद्घोष करने वाले महावीर वर्धमान भारत के इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अध्याय हैं ! तीर्थंकर महावीर ने लोकजीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया , इतिहास को दिशा दी ! निश्चित ही उनका आन्दोलन लोक का ही उद्वेलन था !महावीरवर्धमान ने मानव को दासताओं से,बन्धनों से, विषमता से, अज्ञानसे , रूढिसे और अन्याय से मुक्त करने के लिये चिन्तन किया था।दश- लक्षण धर्म की प्रतिष्ठा की थी। अर्हन,सिद्ध,आचार्य,उपाध्याय और सर्वसाधुता की वन्दना की?? महावीर ने राजमहल को छोडा। बारह बरस तक भारत-भ्रमण करते रहे। सरदी-गरमी-बरसात सही। दुइजन्त -आश्रम हो, चीराकग्राम हो, षणमानी ग्राम हो,कितना अपमान! कितना तिरस्कार!कानों में लकडी के टुकडे ठोक दिये? लेकिन महावीर ने जीवन को सत्य की प्रयोगशाला बना दिया।उनके चिन्तन का केन्द्र कोई पन्थ नहीं था,समूची मानवता थी। अहिंसा परमो धर्म : या परस्परोपग्रहो जीवानां!!मनुष्य ही नहीं जीवमात्र की चिन्ता है।वैष्णवचिन्तन की पृष्ठ्भूमि में इस चिन्तन धारा का महत्व निर्विवाद है॥

महात्मागांधी ने धर्म के आधार पर स्वतन्त्रता का आन्दोलन खड़ा किया ! आजादी के आंदोलन में गांधी जी ने जनता को अपने साथ लिया, सत्य का अहिंसात्मक-आग्रह,सविनय-अवज्ञा्। बापू और जनता के बीच विश्वास का सूत्र था>>>>सत्य। यदि लोकतंत्र की आत्मा लोकचेतना है, तो भारत के संविधान की आत्मा है>>.. >सत्य। यदि हम >>>सत्यमेव जयते <<<<< को संविधान से अलग कर दें तो संविधान अन्यथा सिद्ध हो जायेगा।

कोई भी विचारधारा हो या कोई भी धर्म हो, वह कितना भी मानवीय क्यों न हो । समय के साथ उसमें विकार आना अचरज की बात नहीं है । अन्तत: तो वह मनुष्य ही होता है ,जो उस विचार को या धर्म को जीवन-व्यवहार में लाया है । अच्छे से अच्छा विचार नीयत के खराब होने से खराब हो जाता है । बौद्ध-चिन्तन एक दिन स्त्री को छोड कर प्रारंभ हुआ था किन्तु अन्त में स्त्री के आलिंगन में समा गया ।इसका प्रमाण है >>> तथागत-गुह्यक <<<नामक ग्रन्थ ।

व्यष्टिस्वार्थ सत्तास्वार्थ लोगों को धोखा देने के लिये धर्म का आडंबर ओढ लेता है ! धर्म का नारा दिया जाता है । धर्म का नारा दे कर आक्रमण किया जाता है , आतंक फैलाया जाता है ! धर्म के प्रतीक खडे किये जाते हैं । मिथ्यासिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है ।उन्हें प्रोत्साहन दिया जाता है ।कट्टरता को बढाया जाता है।
धर्म और धर्मसंस्था :::: व्यष्टि और समष्टि के बीच का द्वन्द्व धर्म और धर्मसंस्था के द्वन्द्व के रूप में सामने आता है ! धर्म और धर्मसंस्था भिन्न भिन्न हैं. धर्मसंस्था अपने को ही धर्म के रूप में स्थापित कर लेती है.”साक्षात्‌ अधर्म धर्म का उपदेश कर रहा है ! बेईमानी ईमानदारी का भाष्य लिख रही है ! धर्म और धर्म का तन्त्र ::: धर्म और धर्म-संस्था अथवा धर्म के तन्त्र के अन्तर को जानना आवश्यक है ! दोनों में आकाश-पाताल का अंतर है ! विश्व के किसी धर्म-पन्थ को देख लीजिये। वैभव के बीच महलों में रहने वाला पोप ईसामसीह का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है ? क्या सामान्य मुल्ला मुहम्मदसाहब के विवेक का प्रवक्ता माना जा सकता है ? क्या सामान्य ग्रन्थी गुरु नानक या गुरु तेगबहादुर अथवा गुरु गोविन्दसिंह जैसा है ? क्या सामान्य जैन-मुनि को महावीर वर्धमान माना जा सकता है ? क्या महास्थविर को महात्माबुद्ध कह सकते हैं ? क्या शंकर-पीठ का महन्त आदिशंकराचार्य की प्रतिमूर्ति है ? ईसामसीह और पोप का अन्तर,बुद्ध और महास्थविर का अन्तर,महावीर और मुनि का अन्तर, मुहम्मदसाहब और मुल्ला का अन्तर,गुरु नानक और ग्रन्थी का अन्तर,कबीर और कबीरमठ के महन्त का अन्तर,आदिशंकराचार्य और पीठस्थ महन्त का अन्तर धर्म और धर्म के तन्त्र का अन्तर है ! एक धर्म है और दूसरा धर्मसंस्था?

व्यष्टि और समष्टि के इस द्वन्द्व में जब व्यष्टिस्वार्थ संगठित हो जाता है तब वह लोगों को धोखा देने के लिए विभ्रम पैदा करता है ! अधर्मे धर्मविभ्रम: ! अधर्म में धर्म का विभ्रम ! इसका कारण है पाखंड ! पाखंड धर्म के सभी आडंबर धारण कर लेता है ! चारों ओर धर्म की ध्वजा-पताका लगा देता है ! गीता [ १८ – ३२] ने भी कहा कि लोभ-लालच, प्रभुता , अभिमान , वासना , क्रोध , ममता जैसी तामसी- वृत्तियों से आवृत वह बुद्धि अधर्म को ही धर्म के रूप में जानती और पहचानती है । जीवन के समस्त अर्थ उसे विपरीत ही भासित होते हैं क्योंकि लोभ आदि के कारण सत्य की पहचान कर पाना उसके लिये संभव ही नहीं है >
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी।

समष्टि हित गरीबों का बल है ! सुने री मैने निरबल के बल राम ! निर्बलों के बल का नाम ही राम है ,और निर्बलों के बल का नाम ही धर्म है !! दीनदयालु , दीनबन्धु , दीनानाथ ,पतितपावन , गरीबनिवाज , अनाथों के नाथ । क्यों वह अमीरबन्धु नहीं कहलाया ? धर्म , ईश्वर और आस्था मूल रूप में सबल की नहीं, निर्बलों की जमीन है , निर्बल का बल है ,जिस पर मौका पा कर सबलों ने उसी प्रकार कब्जा कर लिया है , जैसे जमीन पर जमीन-माफिया कब्जा कर लेते हैं । निर्बलों की जमीन पुन: निर्बलों को दिलवाने का सवाल है ।
मेरे अनेक मित्र मानते हैं कि धर्म के कारण ही कलह और युद्ध होते हैं , धर्म अनावश्यक है , शोषण -उत्पीडन का औजार है और भटकाने वाला है और भी बहुत सी बातें वे कहते हैं । दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं , जिनकी राजनीति का आधार धर्म है । वे धर्म के आधार पर लोगों को गोलबन्द करते हैं और लोगों को विभाजित करते हैं ।तीसरे वर्ग में वे लोग हैं जो मानते हैं कि धर्म एक खास वर्ण की रचना है और उन्होंने उसे गरीब लोगों पर जबर्दस्ती लादा है ।क्या धर्म निर्बल लोगों का स्वत:स्फूर्त- आयोजन है ? क्या वह निर्बलों को आश्वस्त करती है ? या आपके शब्दों में विमूढता है ? क्या मनुष्य बुद्धिहीन प्राणी है और इस अनावश्यक परंपरा को व्यर्थ ही ढो रहा है ? दूसरी ओर वे मित्र भी पहचानने की कृपा करें कि इन निर्बल लोगों को ठगना , वंचित करना धर्म है या अधर्म है ? जो इनके भोजन में जहर घोलते हैं , खाद्यपदार्थों में मिलावट करते हैं । जो इनके श्रम का शोषण करते हैं , वे डाक्टर , जो इनको उपचार से वंचित करते हैं , शिक्षा से वंचित करते हैं , इनकी भूमि हडपते हैं , जो तस्कर हैं , माफिये हैं , बलात्कारी हैं , भले ही वे इन्हीं के धर्म का आडंबर धारण करते हैं , क्या धार्मिक हैं ? धर्म तो धर्मध्वज को निन्दित मानता है और कहता है कि > धर्मध्वजानां मुंडीनां वृत्यर्थं इति मे मति : >वित्त-शौचं हि शुचिता न मृद्वारि शुचि: शुचि : । आप मिट्टी से कितनी बार शरीर को रगडते हैं और कितनी बार नहाते हैं , इससे आपकी पवित्रता सिद्ध नहीं होती । आपकी पवित्रता इस बात से सिद्ध होती है कि आपने किस तरीके से धन कमाया है ? धर्म का निर्णय इस बात से होता है कि आपके धन का स्रोत कितना पवित्र है ? यदि आपने टैक्स चुराया है , बैंक के सार्वजनिक धन का हरण किया है तो धर्म आपके लिये आडंबर मात्र है , जिसकी चादर ओढ कर >>> रामनाम जपना ,पराया माल अपना। जिसकी सन्तों ने निन्दा की है ।
धार्मिक-प्रतीक धर्म नहीं ,धर्म के प्रतीक हैं ! धर्म आचरण और व्यवहार का तत्त्व है !मन्दिर -मस्जिद धर्म नहीं , धर्म के उपलक्षण हैं !ऐसे लोग भी हैं, जो मन्दिर -मस्जिद शायद ही जाते हैं, पूजा करें तो करें या न भी करें, वे धर्म-संप्रदाय के किसी बाडे में हों या न हों , परन्तु दूसरों की सहायता करने को दौड पडते हैं। पशु-पक्षी की भी चिन्ता करते हैं। बच्चों को देख कर खुश होते हैं, अन्धों या अपाहिजों को सडक- पार करा देते हैं, वृद्धों की सहायता करते हैं।
किसी जमाने में चर्च इसी पाखंड का केन्द्र बन गया था , विचारशील लोगों ने उसे पहचाना और उसके मिथ्यासिद्धान्तों का खंडन किया ! ईसामसीह हों , मुहम्मद साहब हों , बुद्ध और महावीर हों , शंकराचार्य हों , गोरख और कबीर हों , नानक हों , रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द हों , दयानन्द हों सभी ने पाखंड का सामना किया और उसे ध्वस्त किया !
धर्म नैतिकसत्य है , धर्म मनुष्य और अन्य प्राणियों तथा प्रकृति के प्रति दायित्वबोध जगाता है , जो आदमी और आदमी के बीच लकीरें खींचता है , वह धर्म नहीं राजनीति है !
विशालभारत मार्च १९४० के अंक में छपे एक लेख ने मेरा ध्यान आकर्षित कर लिया है , यह लेख क्या है , असल में यह हार्वर्डविश्वविद्यालय के प्रोफेसर बैंजमिन ई मेज द्वारा लिखी हुई एक रिपोर्ट है । विश्वयुद्ध के कुछ पहले हालैंड के एमस्टरडम नगर में ईसाई-धर्म का एक विश्वसम्मेलन हुआ था , इसमें संसार के भिन्न-भिन्न भागों से आये हुए ईसाई-प्रतिनिधि शामिल हुए थे । अनेक विषयों पर चर्चा हुई थी , किन्तु प्रोफेसर बैंजमिन ई मेज ने यह रिपोर्ट ईसाईधर्म में वर्णभेद पर केन्द्रित करके लिखी है | वहां दक्षिण-अफ्रीका के बांटू , न्यूजीलैंड के मावरी ,रेड-इंडियन ,मलाया ,स्कैंडीनेविया के नव ईसाई ,अमरीका के नीग्रो और यूरोप के यहू्दी लोगों ने अपनी पीडा अभिव्यक्त की । गोल्डकोस्ट के प्रतिनिधि ने बताया कि सरकारें गोरे और काले ईसाइयों में इतना भेद करती है कि दोनों वर्गों के लिये स्कूल और गिरजाघर अलग-अलग हैं ।अमरीका के नीग्रो-प्रतिनिधि ने कहा कि उन्हें हर जगह दुत्कारा जाता है ,पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है । दूसरी ओर हब्शियों के प्रति घृणा और उपेक्षा के बावजूद गोरी-युवतियों द्वारा उनसे विवाह के विवरण भी हैं ।यहूदी-समस्या पर वक्ताओं के दृष्टिकोण भी इस रिपोर्ट में हैं । लगभग पांच पेज की विस्तृत रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ण भेद का मूल कारण धर्म नहीं , सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक विषमता है ।

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्‌ ।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्‌ ।
यतोsभ्युदयनि:श्रेयस स सिद्धि: स धर्म: ।
धारयतीति धर्म: ।

–डा0 श्री राजेन्द्र रंजन जी चतुर्वेदी

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