महारानी मदालसा ने अपने ६ पुत्रों को वैराग्य की लोरी सुना-सुनाकर साधु बना दिया । महाराजा के निवेदन पर अपने सातवें पुत्र को राजनीति की शिक्षा देकर उत्तराधिकारी बनाया ।

मदालसा जो लोरी अपने पुत्रों को सुनाती थी, वह यह है :—

“शुद्धोsसि बुद्धोsसि, निरंजनोsसि ।
संसारमाया परिवर्जितोsसि ।
संसारस्वप्नं त्यज मोहनिद्रां
मदालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ।।”

मदालसा राजकुमार ऋतुध्वज की पत्नी थी । ऋतुध्वज एक बार असुरों से युद्ध करने गये, युद्ध में इनकी सेना असुर पक्ष पर भारी पड़ रही थी, ऋतुध्वज की सेना का मनोबल टूट जाये इसलिये मायावी असुरों ने ये अफवाह फैला दी कि ऋतुध्वज मारे गये हैं । ये खबर ऋतुध्वज की पत्नी मदालसा तक भी पहुँची तो वो इस गम को बर्दाश्त नहीं कर सकी और इस दुःख में उसने अपने प्राण त्याग दिये। इधर असुरों पर विजय प्राप्त कर जब ऋतुध्वज लौटे तो वहां मदालसा को नहीं पाया । मदालसा के गम ने उन्हें मूर्छित कर दिया और राज-काज छोड़कर अपनी पत्नी के वियोग में वो विक्षिप्तों की तरह व्यवहार करने लगे।

ऋतुध्वज के एक प्रिय मित्र थे नागराज ! उनसे अपने मित्र की ये अवस्था देखी न गई और वो हिमालय पर तपस्या करने चले गये ताकि महादेव शिव को प्रसन्न कर सकें । शिव प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो नागराज ने उनसे अपने लिये कुछ न मांग कर अपने मित्र ऋतुध्वज के लिये मदालसा को पुनर्जीवित करने की मांग रख दी । शिवजी के वरदान से मदालसा अपने उसी आयु के साथ मानव-जीवन में लौट आई और पुनः ऋतूध्वज को प्राप्त हुई ।

मृत्यु के पश्चात मिले पुनर्जीवन ने मदालसा को मानव शरीर की नश्वरता और जीवन के सार-तत्व का ज्ञान करा दिया था, अब वो पहले वाली मदालसा नहीं थी लेकिन उसने अपने व्यवहार से इस बात को प्रकट नहीं होने दिया । पति से वचन लिया कि होने वाली संतानों के लालन-पालन का दायित्व उसके ऊपर होगा और पति उसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगें । मदालसा गर्भवती हुई तो अपने गर्भस्थ शिशु को संस्कारित करने लगी । उसे भी वो ज्ञान देने लगी जिस ज्ञान से वो स्वयं परिपूर्ण थी ।
वो अपने गर्भस्थ शिशु को लोरी सुनाते हुये कहती थी कि “ऐ मेरे बेटे, तू शुद्ध है, बुद्ध है, संसार की माया से निर्लिप्त है ।”
एक के बाद एक तीन पुत्र हुए, पिता क्षत्रिय थे, उनकी मान्यता थी कि पुत्रों का नाम भी क्षत्रिय-गुणों के अनुरूप हो इसलिये उस आधार पर अपने पुत्रों का नाम रखा, विक्रांत, सुबाहू और शत्रुमर्दन । उसके सारे पुत्र मदालसा से संस्कारित थे, मदालसा ने उन्हें माया से निर्लिप्त निवृतिमार्ग का साधक बनाया था इसलिये सबने राजमहल त्यागते हुये संन्यास ले लिया । पिता बड़े दु:खी हुये कि ऐसा हुआ तो कैसे चलेगा ।
मदालसा फिर से गर्भवती हुई तो पति ने अनुरोध किया कि हमारी सब संतानें अगर निवृतिमार्ग की पथिक बन गई तो ये विराट राज-पाट को कौन संभालेगा इसलिये कम से कम इस पुत्र को तो राजकाज की शिक्षा दो ।

मदालसा ने पति की आज्ञा मान ली । जब चौथा पुत्र पैदा हुआ तो पिता अपने पहले तीन पुत्रों की तरह उसका नाम भी क्षत्रियसूचक रखना चाहते थे जिसपर मदालसा हँस पड़ी और कहा, आपने पहले तीन पुत्रों के नाम भी ऐसे ही रखे थे उससे क्या अंतर पड़ा फिर इसका क्षत्रियोचित नाम रखकर भी क्या हासिल होगा ?
राजा ऋतुध्वज ने कहा, फिर तुम ही इसका नाम रखो. मदालसा ने चौथे पुत्र को अलर्क नाम दिया और उसे राजधर्म और क्षत्रियधर्म की शिक्षा दी ।
अलर्क दिव्य माँ से संस्कारित थे इसलिये उनकी गिनती सर्वगुणसंपन्न राजाओं में होती है । उन्हें राजकाज की शिक्षा के साथ माँ ने न्याय, करुणा, दान इन सबकी भी शिक्षा दी थी ।

वाल्मीकि रामायण में आख्यान मिलता है कि एक नेत्रहीन ब्राह्मण अलर्क के पास आया था और अलर्क ने उसे अपने दोनों नेत्र दान कर दिये थे. इस तरह अलर्क विश्व के पहले नेत्रदानी हैं।
इस अद्भुत त्याग की शिक्षा अलर्क को माँ मदालसा के संस्कारों से ही तो मिली थी ।

“बालक क्षत्रिय कुल में जन्मा हो तो ब्रह्मज्ञानी की जगह रणकौशल से युक्त होगा, नाम शूरवीरों जैसे होंगें तो उसी के अनुरूप आचरण करेगा इन सब स्थापित मान्यताओं को मदालसा ने एक साथ ध्वस्त करते हुए दिखा दिया कि माँ अगर चाहे तो अपने बालक को शूरवीर और शत्रुंजय बना दे और वो अगर चाहे तो उसे धीर-गंभीर, महात्मा, ब्रह्मज्ञानी और तपस्वी बना दे । अपने पुत्र को एक साथ साधक और शासक दोनों गुणों से युक्त करने का दुर्लभ काम केवल माँ का संस्कार कर सकता है जो अलर्क में माँ मदालसा ने भरे थे ।

स्वामी विवेकानंद ने यूं ही नहीं कहा था कि अगर मेरी कोई संतान होती तो मैं जन्म से ही उसे मदालसा की लोरी सुनाते हुये कहता, *त्वमअसि निरंजन…….

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– सौजन्य से श्री आनंद बाबा महाराज

Lullaby of Madalsa

Queen Madalsa made her six sons a monk by reciting the lullaby of quiteness. At the request of the Maharaja, she taught her seventh son politics who was eventually made a successor of the kingdom.

The lullaby which Madalsa used to narrate to her sons was:
“शुद्धोsसि बुद्धोsसि, निरंजनोsसि ।
संसारमाया परिवर्जितोsसि ।_
संसारस्वप्नं त्यज मोहनिद्रां
मदालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ।।”

Madalasa was the wife of Prince Ritudhwaj. Ritudhwaj once went to battle with the Asuras, his army was getting heavy on the Asur side in the war, so in order to break his army’s morale, the elusive Asuras spread the rumor that Ritudhwaj had been killed. When this news reached Ritudhwaja’s wife Madalsa, she could not tolerate this sorrow and gave up her life in this sorrow. Here, when Ritadhwaj returned after conquering the Asuras, he could not find Madalsa there. The sorrow of Madalsa made him unconscious and hence resulted into leaving the kingdom. He began to behave like a maniac in sorrow of his wife.

Nagraj was a dear friend of Ritudhwaj! Nagraj could not see that state of his dear friend he went to do tapasya on the Himalayas to please Mahadev. Shiva appeared and asked to ask for a boon, and Nagraj asked him to revive Madalsa for his friend Ritudhwaja, not asking anything for himself. With the boon of Shiva, Madalasa returned to human life with the same age and was again received by Ritudhwaja.

The resurrection after death had made Madalasa aware of the impermanence of the human body and the essence of life, now she was not the earlier Madalasa but she did not allow this to be revealed by her behavior. Took a promise from husband that the responsibility for the upbringing of the offsprings will be on her and the husband will not interfere in it. When Madalasa became pregnant, she began to give principles of ethical behavior to her unborn baby.

She used to tell a lullaby to her unborn child, “O my son, you are pure, you are a Buddha, you are detached with the illusion of the world.”

There were three sons one after the other. The father was a Kshatriya, he believed that the names of the sons should also be in accordance with the Kshatriya-qualities, so on that basis he named his sons, Vikrant, Subahu and Shatramardan. All his sons were cultured from Madalsa, Madalsa made them detached, so everyone left the palace and took renunciation. The father was very sad.

When Madalsa became pregnant again, the husband requested that if all our children become deatched, then who will take care of this great kingdom, so at least teach this son rajdharma and €
kshatriyadharma..

Madalasa obeyed her husband wishes. When the fourth son was born, the father wanted to keep his name as Kshatriyushak like his first three sons, on which Madalsa laughed and said, what was the difference with the name of the first three sons, and what will happen by keeping the name Kshatriyot?

King Ritudhwaj said, then you name it. Madalasa named the fourth son Alark and taught him Rajdharma and Kshatriyadharma.

Alark was taught by the divine mother, so he is counted among all the virtuous kings. Along with the education of Rajkaj, mother also taught justice, compassion and charity.

There is a legendary story in Valmiki Ramayana that a blind Brahmin came to Alark and Alark donated both his eyes to him. In this way, Alark is the first who donated his both eyes..
Alark had learned this wonderful sacrifice from the rites of Maa Madalsa.

“If a child is born in a Kshatriya clan, he will behave according to his kshatriya name. Madalsa destroyed all these established beliefs, she showed that if the mother wants her child to be a knight then she can make him and if she wants to make him patient, serious, mahatma, and ascetic then she makes him that too. The rare task of combining her son with both the seeker and the ruler’s qualities can only be performed by the mother, which was filled by Mother Madalsa in Alark.

Swami Vivekananda said that if I had any child, I would have sung him the lullaby of Madalsa from birth, त्वमअसि निरंजन…….

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– Courtesy Mr. Anand Baba Maharaj

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