देवर्षि नारद !

(नारद मुनि, हिन्दु शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के छः पुत्रों में से छठे है। उन्होने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया । वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के २६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है – देवर्षीणाम् च नारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं।)


“नारदजी को अपने जमाने का समर्पित- पत्रकार या संवाददाता कहा जा सकता है । एक जनपद का दुखसुख दूसरी जगह और दूसरे जनसमुदाय के सवालों को तीसरी जगह सुनाना और उनके समाधान खोजना > जैसे उनके जीवन का एक मिशन बन गया था। लोकमंगल की कामना से ओतप्रोत थे ।”


भागवत में उनके कई जन्मों का उल्लेख है, इससे एक बात स्पष्ट होती है कि नारद के विराट-व्यक्तित्व में एक पूरी नारद-परंपरा की ही अन्तर्भुक्ति हुई है।


नारायण-नारायण उनका उद्घोष है, नारायण में विष्णु-परंपरा और फिर समूची दश-अवतार तथा आगे चौबीस-अवतार की परंपराएं नारायण में अन्तर्भुक्त हैं।


भक्तिसूत्र उनकी रचना है। ध्यान देने योग्य है कि वे ही हैं, जिनसे वाल्मीकि पूछते हैं >>> कोन्वस्मिन्सांप्रतं लोके बलवान् कश्चवीर्यवान? तब नारद ही उन्हें रामकथा का उपदेश करते हैं >> इक्ष्वाकु-वंश प्रभवो रामोनाम जनै: श्रुत:।
और नारद ही हैं जो वेदव्यास से कहते हैं कि अवश्य ही आपने महाभारत की रचना की है किन्तु भक्ति के बिना शास्त्र अधूरा है, आप भागवत की रचना करिये।
नारद ही हैं जो ध्रुव को द्वादशाक्षर का उपदेश करते हैं और नारद ही हैं जो प्रह्लाद की मां कयाधु को भागवतधर्म का उपदेश करते हैं , नारद ही हैं जो कीर्तनसंगीत के प्रतिपादक हैं । लोगों को जोड़ देते हैं।
नारद ही हैं जो जातिगत उच्चता या नीचता के विरुद्ध आवाज उठाते हैं ।
भागवत में वे कहते हैं कि मेरी मां दासी थी, मेरी अवस्था पांच वर्ष की थी, तब वह अंधेरे में गाय दुहने निकली, उसका पैर सांप पर पड़ गया, और सर्पदंश से वह मर गयी।

अथर्ववेद, ऐतरेय, छान्दोग्य, महाभारत, भागवत एवं अन्य अनेकानेक पुराणों में उनका चरित्र वर्णित है, इसीके साथ विभिन्न जनपदों, प्रदेशों की लोककहानियों के वे एक महत्वपूर्ण-पात्र हैं, जो जहां चाहे प्रकट हो जाते हैं और तीनों लोकों में अबाध विचरण करते रहते हैं।
नारायण -नारायण !!!

– सौजन्य से डॉ0श्री राजेन्द्र रंजन जी चतुर्वेदी

Devaarishi Narad !

(According to Hindu Scriptures, Narada Muni is the sixth of the six sons of Lord Brahma. He attained the post of Brahmarshi through hard penance. He is considered one of the exclusive devotees of Lord Vishnu.
In the 24th verse of the tenth chapter of the Shrimad Bhagavad Gita, Lord Shri Krishna himself has acknowledged his importance and said – देवर्षीणाम् च नारद:। : I am Narada among the Devaarishis)

Naradji can be called a dedicated journalist or reporter of his time. It was a mission of his life to tell the unusual news of one place to another place and to listen to the questions of other people and find solutions. He was filled with the desire of Lokmangal – MANKIND.”

The Bhagavata mentions his many births,,,, one thing is clear from this that the entire personality of Narada has been embodied in the Great Tradition of Narada.

Narayana-Narayana is his manifestation, Vishnu-tradition in Narayana and then the entire Dasha-avatara and further twenty-four-incarnation traditions are embodied in Narayana.

Bhaktisutra is his creation. It is worth noting that they are the ones whom Valmiki asks >> कोन्वस्मिन्सांप्रतं लोके बलवान् कश्चवीर्यवान? Then Narada teaches him the story of Ramakatha >> इक्ष्वाकु-वंश प्रभवो रामोनाम जनै: श्रुत:।

And Narada is the one who says to The Ved-Vyas that you have definitely written the great Epic, Mahabharata, but without devotion the scripture is incomplete & for that you should write Bhagavata.

Narada is the one who preaches the Dvadasakshhara to Dhruva and it is Narada who preaches Bhagavatadharma to Kayadhu, the mother of Prahlada. Narada, who is the exponent of the Kirtanasangeet which gets people together.

Narada is the only one who raises voice against caste highness or lowliness.
In the Bhagwat, he says that my mother was a maid, I was five years old, when she went out milk the cow in the dark, her foot fell on the snake, and she died of snakebite.

His character is described in the Atharvaveda, Aitareya, Chandogya, Mahabharata, Bhagwat and many other Puranas, along with this, he is an important character of the folklore of different districts, regions, states, who appears anywhere and keeps wandering freely in the three worlds.

Narayan Narayan !!!

– Courtesy Dr. Shri Rajendra Ranjan G. Chaturvedi

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