(राम-राज कैसा होता है, गोस्वामी तुलसीदास जी ने बखूबी लिखा है)

राम राज बैठे त्रैलोका।
हरषित भए गए सब सोका।।

बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।

दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।
सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं।
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ।।
(रा•च•मा• 7। 20। 7–8; 21। 1¸ 5–6¸ 8; 21)

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के सिंहासन पर आसीन होते ही सर्वत्र हर्ष व्याप्त हो गया, सारे भय–शोक दूर हो गए एवं दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति मिल गई। कोई भी अल्पमृत्यु, रोग–पीड़ा से ग्रस्त नहीं था, सभी स्वस्थ, बुद्धिमान, साक्षर, गुणज्ञ, ज्ञानी तथा कृतज्ञ थे।

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