भारतीय – विद्या परंपरा और उपासना के इतिहास में दत्तात्रेय की महिमा व्यापक है ।

महर्षि-अत्रि और अनुसूया के पुत्र और दुर्वासा के भाई !
वे महात्रिपुरसुन्दरी के उपासक और श्रीविद्या-उपासना के परमाचार्य हैं !
परशुराम के दीक्षागुरु !

अवधूत-उपनिषद, जाबालोपनिषद, अवधूतगीता, परशुरामकल्पसूत्र आदि के रचनाकार !
किन्तु सहस्रार्जुन कार्तवीर्य को कृपापूर्वक वर प्रदान भी कर दिया ।
विष्णुधर्मोत्तर में उल्लेख है कि इन्होंने कार्तवीर्य के माध्यम से म्लेच्छ-उन्मूलन भी कराया था ।
दत्तात्रेय ने कबूतर, अजगर, वेश्या, मछली , हिरन, भृंगी , मकड़ी आदि को भी गुरु बनाया था, जिसका वर्णन भागवत में यदु और अवधूत के संवाद रूप में है । जिसमें कहा गया है कि वे जड़ उन्मत्त और पिशाच की तरह रहते थे, किन्तु मुक्त-भाव में आनन्द की भूमिका में रहते थे ।

विष्णु के चौबीस अवतारों में परिगणित {शिशुपालवध} महाराष्ट्र के सरस्वतीगंगाधर ने >गुरुचरित्र <लिखा था । जिसमें वे ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप में माने गये हैं , तीन मुख छह हाथ हैं, कमंडल, माला , त्रिशूल, डमरू, शंख और चक्र धारण किये हैं, बगल में झोली है, अवधूत और विरक्त- संन्यासी हैं, यज्ञोपवीत नहीं है। गूलरवृक्ष है, गाय [माया], चार श्वान हैं । [ये कुत्ते इच्छा, वासना, आशा व तृष्णा के प्रतीक अथवा काम, क्रोध, मद और मत्सर के प्रतीक हैं किसी-किसी ने इन्हें चार वेद का प्रतीक भी बतलाया है ]

ये तान्त्रिक हैं और तान्त्रिक में भी वाममार्ग के निकट प्रतीत होते हैं ।
पंचमकार स्वीकार है ।मदिरा भी है ! सुन्दरी भी है । मांस भी है। कपाल भी है । भोग भी है ।
अलर्क को इन्होंने योगचर्या का उपदेश दिया था ।
गिरनारक्षेत्र श्रीदत्तात्रेय का पीठ है !
जब संवर्त ने परशुराम को दत्तात्रेय के संबंध में बताया तो परशुराम गुरुदीक्षा प्राप्त करने के लिये गन्धमादन-पर्वत पर चले गये, वहां दत्तात्रेय से श्रीविद्या की दीक्षा और त्रिपुरारहस्य प्राप्त किया ।
जब वे उनके आश्रम में पंहुचे < दत्तात्रेय की गोद में उस समय एक सुन्दरी थी ।दतात्रेय ने कहा कि > हम तो पतित आचरण-वाले हैं , आप मेरे पास आये ??
इसी क्रम में परशुराम और दत्तात्रेय का जो संवाद हुआ, वह > त्रिपुरारहस्य < ग्रन्थ के रूप में है ।

– साभार डा0 श्री राजेन्द्र रंजन जी चतुर्वेदी

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