धर्म

धर्म का सवाल मूल रूप से व्यष्टि और समष्टि के सम्बन्ध का प्रश्न है ! व्यष्टि और समष्टि के बीच द्वन्द्व चलता ही रहता है और इस द्वन्द्व में धर्म का मूल तत्त्व भी बार-बार आच्छादित हो जाता है ! धर्म का मूल तत्त्व समन्वय है, सामंजस्य है , सहिष्णुता है , । दूसरे शब्दों में कहें तो सामाजिकमन में स्थायीभाव [सत्य-अहिंसा -दया आदि ] का आधान करने वाली प्रक्रिया धर्म है । समाज ही धर्म का विधान करते हुए विनय,समर्पण , उदारता , दान , अपरिग्रह , सत्य , प्रेम ,अहिंसा , आर्जव , समता , संतोष आदि को चित्त में प्रतिष्ठित करता है !
गीता कहती है

  • अद्वेष्टा सर्वभूतानां = किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष-भाव न हो !
  • मैत्र: करुण एव च = द्वेष न होना ही काफी नहीं है , सभी के प्रति मैत्रीभाव हो और निर्बल के प्रति दया हो !
  • निर्ममो – निरहंकार:= मेरा पन न हो , अभिमान भी न हो !
  • समदु:ख:सुखक्षमी = सुखदुख में समान क्षमता से युक्त हो !
  • यस्मान्नोद्विजते लोको = जिससे लोक को उद्विग्नता न हो ।
  • लोकान्नोद्विजते च य: = उसे स्वयं भी लोक से उद्वेग न हो ।
  • सम: शत्रौ च मित्रेषु तथा मानापमानयो: = मान हो या अपमान ,शत्रु हो या मित्र समान दृष्टि वाला हो ~!

ये समस्त गुण अथवा भाव समष्टि-भाव की प्रतिष्ठा करने वाले हैं !
सत्यान्नास्ति परो धर्म: ! अहिंसा परमोधर्म: ! परहित सरिस धरम नहि भाई ! समन्वय धर्म है ,समता धर्म है , न्याय धर्म है , क्षमा धर्म है । परोपकार धर्म है , सत्य धर्म है ,दया धर्म है ! अपरिग्रह धर्म है !सामाजिकता धर्म है ! ईमानदारी धर्म है । कर्तव्यनिष्ठा धर्म है ! प्रेम धर्म है, विनय धर्म है , कृतज्ञता धर्म है !निरभिमान होना धर्म है ! मनुष्यता धर्म है ! व्यक्तिजीवन और सामाजिकजीवन का समन्वय करके उत्कर्ष-उन्नयन करना धर्म है !

भागवत में ही प्रसंग है कि नारद जब युधिष्ठिर को प्रह्लाद का चरित्र सुनाते हैं , तभी युधिष्ठिर नारद से प्रश्न करते हैं कि >> हे देवर्षि ! मैं सनातनधर्म का स्वरूप जानना चाहता हूं । तब नारद युधिष्ठिर को सनातनधर्म का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि >>>>>>>>>> सत्य धर्म है , दया धर्म है , तप धर्म है , पवित्रता धर्म है ,सहनशीलता धर्म है , उचित-अनुचित का विचार धर्म है , मन का संयम और इन्द्रियों का दमन धर्म है ,अहिंसा और ब्रह्मचर्य धर्म है , त्याग-स्वाध्याय-सरलता और संतोष धर्म हैं । सबको समान भाव से देखना और समान भाव से व्यवहार करना धर्म है, सेवा धर्म है , धीरे-धीरे भोग-प्रवृत्ति से उबरना धर्म है , विनय [अभिमान न करना] धर्म है , मौन धर्म है ,आत्मचिन्तन धर्म है , जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं >>अन्न आदि का यथायोग्य विभाजन धर्म है , सभी में देव-भाव रखना धर्म है >>

सीयराम मय सब जग जानी !

भगवंछ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्म सनातनम्‌ । वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायण-मुखाच्छ्रुतम्‌ ।
सत्यं दया तपं शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:। अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्‌ !
संतोष: समदृक्सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै: । नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्‌ !
अन्नाद्यादे: संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत: ।तेष्वात्मदेवता बुद्धि:सुतरां नृषु पांडव: । भागवत ११ – ८-११

धर्म का भाव समष्टि का भाव है और बुद्ध ने समष्टिभाव को किस प्रकार से जगाया यह समझने की बात है !भगवान बुद्ध उस समय बेलुवन में विहार कर रहे थे । एक गृहस्थ ने स्नान किया और उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम-ऊपर और नीचे की छह दिशाओं को प्रणाम किया । भगवान बुद्ध ने उससे इसका तात्पर्य पूछा तो उसने कहा कि मेरे पिताजी ने छह दिशाओं को नमस्कार करने का उपदेश किया था । भगवान बुद्ध ने कहा कि यह तो आर्यधर्म नहीं है । गृहस्थ ने कहा तो आप मुझे छह दिशाओं को नमस्कार करने वाले आर्यधर्म का उपदेश करिये । भगवान बुद्ध ने उपदेश किया >> माता-पिता पूर्व-दिशा हैं ।आचार्य दक्षिणदिशा हैं । पत्नी और पुत्र पश्चिमदिशा हैं ।मित्र और साथी उत्तरदिशा हैं । भृत्य और कर्मकर नीचे की दिशा हैं तथा ब्राह्मण और श्रमण ऊपर की दिशा हैं । इनके प्रति अपने दायित्व को निभाना ही छह दिशाओं को नमस्कार है ,यह आर्य धर्म है ।
बुद्ध ने बार-बार कहा कि >>
चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ,लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं । देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मंझे कल्याणं- परियोसान कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ। [महावग्ग: : विनयपिटक]

भिक्षुओ, बहुजनसुख के लिये, बहुजन हित के लिये , लोगों को सुख पंहुचाने के लिये निरन्तर भ्रमण करते रहो । आदि-मध्य-और अन्त सभी अवस्थाओं के लिये कल्याणमय धर्म का भाव और आचरण- सहित प्रकाश करते रहो !”
परस्परोपग्रहो जीवानां!! का उद्घोष करने वाले महावीर वर्धमान भारत के इतिहास में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अध्याय हैं ! तीर्थंकर महावीर ने लोकजीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया , इतिहास को दिशा दी ! निश्चित ही उनका आन्दोलन लोक का ही उद्वेलन था !महावीरवर्धमान ने मानव को दासताओं से,बन्धनों से, विषमता से, अज्ञानसे , रूढिसे और अन्याय से मुक्त करने के लिये चिन्तन किया था।दश- लक्षण धर्म की प्रतिष्ठा की थी। अर्हन,सिद्ध,आचार्य,उपाध्याय और सर्वसाधुता की वन्दना की?? महावीर ने राजमहल को छोडा। बारह बरस तक भारत-भ्रमण करते रहे। सरदी-गरमी-बरसात सही। दुइजन्त -आश्रम हो, चीराकग्राम हो, षणमानी ग्राम हो,कितना अपमान! कितना तिरस्कार!कानों में लकडी के टुकडे ठोक दिये? लेकिन महावीर ने जीवन को सत्य की प्रयोगशाला बना दिया।उनके चिन्तन का केन्द्र कोई पन्थ नहीं था, समूची मानवता थी। अहिंसा परमो धर्म : या परस्परोपग्रहो जीवानां!! मनुष्य ही नहीं जीवमात्र की चिन्ता है।वैष्णवचिन्तन की पृष्ठ्भूमि में इस चिन्तन धारा का महत्व निर्विवाद है॥

महात्मागांधी ने धर्म के आधार पर स्वतन्त्रता का आन्दोलन खड़ा किया ! आजादी के आंदोलन में गांधी जी ने जनता को अपने साथ लिया ,सत्य का अहिंसात्मक-आग्रह,सविनय-अवज्ञा्। बापू और जनता के बीच विश्वास का सूत्र था>>>>सत्य। यदि लोकतंत्र की आत्मा लोकचेतना है, तो भारत के संविधान की आत्मा है>>.. >सत्य। यदि हम >>>सत्यमेव जयते <<<<< को संविधान से अलग कर दें तो संविधान अन्यथा सिद्ध हो जायेगा। कोई भी विचारधारा हो या कोई भी धर्म हो ,वह कितना भी मानवीय क्यों न हो । समय के साथ उसमें विकार आना अचरज की बात नहीं है । अन्तत: तो वह मनुष्य ही होता है ,जो उस विचार को या धर्म को जीवन-व्यवहार में लाया है । अच्छे से अच्छा विचार नीयत के खराब होने से खराब हो जाता है । बौद्ध-चिन्तन एक दिन स्त्री को छोड कर प्रारंभ हुआ था किन्तु अन्त में स्त्री के आलिंगन में समा गया ।इसका प्रमाण है >>> तथागत-गुह्यक <<<नामक ग्रन्थ । व्यष्टिस्वार्थ सत्तास्वार्थ लोगों को धोखा देने के लिये धर्म का आडंबर ओढ लेता है ! धर्म का नारा दिया जाता है । धर्म का नारा दे कर आक्रमण किया जाता है , आतंक फैलाया जाता है ! धर्म के प्रतीक खडे किये जाते हैं । मिथ्यासिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है ।उन्हें प्रोत्साहन दिया जाता है ।कट्टरता को बढाया जाता है ।

धर्म और धर्मसंस्था :::: व्यष्टि और समष्टि के बीच का द्वन्द्व धर्म और धर्मसंस्था के द्वन्द्व के रूप में सामने आता है ! धर्म और धर्मसंस्था भिन्न भिन्न हैं. धर्मसंस्था अपने को ही धर्म के रूप में स्थापित कर लेती है। “साक्षात्‌ अधर्म धर्म का उपदेश कर रहा है ! बेईमानी ईमानदारी का भाष्य लिख रही है ! धर्म और धर्म का तन्त्र :::धर्म और धर्म-संस्था अथवा धर्म के तन्त्र के अन्तर को जानना आवश्यक है ! दोनों में आकाश-पाताल का अंतर है ! विश्व के किसी धर्म-पन्थ को देख लीजिये। वैभव के बीच महलों में रहने वाला पोप ईसामसीह का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है ? क्या सामान्य मुल्ला मुहम्मदसाहब के विवेक का प्रवक्ता माना जा सकता है ? क्या सामान्य ग्रन्थी गुरु नानक या गुरु तेगबहादुर अथवा गुरु गोविन्दसिंह जैसा है ? क्या सामान्य जैन-मुनि को महावीर वर्धमान माना जा सकता है ? क्या महास्थविर को महात्माबुद्ध कह सकते हैं ? क्या शंकर-पीठ का महन्त आदिशंकराचार्य की प्रतिमूर्ति है ? ईसामसीह और पोप का अन्तर, बुद्ध और महास्थविर का अन्तर, महावीर और मुनि का अन्तर, मुहम्मदसाहब और मुल्ला का अन्तर, गुरु नानक और ग्रन्थी का अन्तर, कबीर और कबीरमठ के महन्त का अन्तर, आदिशंकराचार्य और पीठस्थ महन्त का अन्तर धर्म और धर्म के तन्त्र का अन्तर है ! एक धर्म है और दूसरा धर्मसंस्था? व्यष्टि और समष्टि के इस द्वन्द्व में जब व्यष्टिस्वार्थ संगठित हो जाता है तब वह लोगों को धोखा देने के लिए विभ्रम पैदा करता है !

अधर्मे धर्मविभ्रम :! अधर्म में धर्म का विभ्रम ! इसका कारण है पाखंड ! पाखंड धर्म के सभी आडंबर धारण कर लेता है ! चारों ओर धर्म की ध्वजा-पताका लगा देता है ! गीता [ १८ – ३२] ने भी कहा कि लोभ-लालच, प्रभुता , अभिमान , वासना ,क्रोध , ममता जैसी तामसी- वृत्तियों से आवृत वह बुद्धि अधर्म को ही धर्म के रूप में जानती और पहचानती है । जीवन के समस्त अर्थ उसे विपरीत ही भासित होते हैं क्योंकि लोभ आदि के कारण सत्य की पहचान कर पाना उसके लिये संभव ही नहीं है >
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी ।
समष्टि हित गरीबों का बल है !
सुने री मैने निरबल के बल राम ! निर्बलों के बल का नाम ही राम है ,और निर्बलों के बल का नाम ही धर्म है !! दीनदयालु , दीनबन्धु , दीनानाथ ,पतितपावन , गरीबनिवाज , अनाथों के नाथ । क्यों वह अमीरबन्धु नहीं कहलाया ? धर्म , ईश्वर और आस्था मूल रूप में सबल की नहीं, निर्बलों की जमीन है , निर्बल का बल है , जिस पर मौका पा कर सबलों ने उसी प्रकार कब्जा कर लिया है , जैसे जमीन पर जमीन-माफिया कब्जा कर लेते हैं । निर्बलों की जमीन पुन: निर्बलों को दिलवाने का सवाल है ।
मेरे अनेक मित्र मानते हैं कि धर्म के कारण ही कलह और युद्ध होते हैं , धर्म अनावश्यक है , शोषण -उत्पीडन का औजार है और भटकाने वाला है और भी बहुत सी बातें वे कहते हैं । दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं , जिनकी राजनीति का आधार धर्म है । वे धर्म के आधार पर लोगों को गोलबन्द करते हैं और लोगों को विभाजित करते हैं । तीसरे वर्ग में वे लोग हैं जो मानते हैं कि धर्म एक खास वर्ण की रचना है और उन्होंने उसे गरीब लोगों पर जबर्दस्ती लादा है । क्या धर्म निर्बल लोगों का स्वत:स्फूर्त- आयोजन है ? क्या वह निर्बलों को आश्वस्त करती है ? या आपके शब्दों में विमूढता है ? क्या मनुष्य बुद्धिहीन प्राणी है और इस अनावश्यक परंपरा को व्यर्थ ही ढो रहा है ? दूसरी ओर वे मित्र भी पहचानने की कृपा करें कि इन निर्बल लोगों को ठगना , वंचित करना धर्म है या अधर्म है ? जो इनके भोजन में जहर घोलते हैं , खाद्यपदार्थों में मिलावट करते हैं । जो इनके श्रम का शोषण करते हैं , वे डाक्टर , जो इनको उपचार से वंचित करते हैं , शिक्षा से वंचित करते हैं , इनकी भूमि हडपते हैं , जो तस्कर हैं , माफिये हैं , बलात्कारी हैं , भले ही वे इन्हीं के धर्म का आडंबर धारण करते हैं , क्या धार्मिक हैं ? धर्म तो धर्मध्वज को निन्दित मानता है और कहता है कि

* धर्मध्वजानां मुंडीनां वृत्यर्थं इति मे मति :
* वित्त-शौचं हि शुचिता न मृद्वारि शुचि: शुचि :

आप मिट्टी से कितनी बार शरीर को रगडते हैं और कितनी बार नहाते हैं , इससे आपकी पवित्रता सिद्ध नहीं होती । आपकी पवित्रता इस बात से सिद्ध होती है कि आपने किस तरीके से धन कमाया है ? धर्म का निर्णय इस बात से होता है कि आपके धन का स्रोत कितना पवित्र है ? यदि आपने टैक्स चुराया है , बैंक के सार्वजनिक धन का हरण किया है तो धर्म आपके लिये आडंबर मात्र है , जिसकी चादर ओढ कर >>> रामनाम जपना ,पराया माल अपना । जिसकी सन्तों ने निन्दा की है ।
धार्मिक-प्रतीक धर्म नहीं, धर्म के प्रतीक हैं ! धर्म आचरण और व्यवहार का तत्त्व है ! मन्दिर-मस्जिद धर्म नहीं , धर्म के उपलक्षण हैं ! ऐसे लोग भी हैं, जो मन्दिर -मस्जिद शायद ही जाते हैं, पूजा करें तो करें या न भी करें, वे धर्म-संप्रदाय के किसी बाडे में हों या न हों, परन्तु दूसरों की सहायता करने को दौड पडते हैं। पशु-पक्षी की भी चिन्ता करते हैं। बच्चों को देख कर खुश होते हैं, अन्धों या अपाहिजों को सडक- पार करा देते हैं, वृद्धों की सहायता करते हैं।
किसी जमाने में चर्च इसी पाखंड का केन्द्र बन गया था , विचारशील लोगों ने उसे पहचाना और उसके मिथ्यासिद्धान्तों का खंडन किया ! ईसामसीह हों , मुहम्मद साहब हों , बुद्ध और महावीर हों , शंकराचार्य हों , गोरख और कबीर हों , नानक हों , रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द हों, दयानन्द हों सभी ने पाखंड का सामना किया और उसे ध्वस्त किया !

धर्म नैतिकसत्य है, धर्म मनुष्य और अन्य प्राणियों तथा प्रकृति के प्रति दायित्वबोध जगाता है, जो आदमी और आदमी के बीच लकीरें खींचता है, वह धर्म नहीं राजनीति है !

विशालभारत मार्च १९४० के अंक में छपे एक लेख ने मेरा ध्यान आकर्षित कर लिया है , यह लेख क्या है , असल में यह हार्वर्डविश्वविद्यालय के प्रोफेसर बैंजमिन ई मेज द्वारा लिखी हुई एक रिपोर्ट है । विश्वयुद्ध के कुछ पहले हालैंड के एमस्टरडम नगर में ईसाई-धर्म का एक विश्वसम्मेलन हुआ था, इसमें संसार के भिन्न-भिन्न भागों से आये हुए ईसाई-प्रतिनिधि शामिल हुए थे । अनेक विषयों पर चर्चा हुई थी, किन्तु प्रोफेसर बैंजमिन ई मेज ने यह रिपोर्ट ईसाईधर्म में वर्णभेद पर केन्द्रित करके लिखी है | वहां दक्षिण-अफ्रीका के बांटू , न्यूजीलैंड के मावरी, रेड-इंडियन, मलाया, स्कैंडीनेविया के नव ईसाई, अमरीका के नीग्रो और यूरोप के यहू्दी लोगों ने अपनी पीडा अभिव्यक्त की । गोल्डकोस्ट के प्रतिनिधि ने बताया कि सरकारें गोरे और काले ईसाइयों में इतना भेद करती है कि दोनों वर्गों के लिये स्कूल और गिरजाघर अलग-अलग हैं ।अमरीका के नीग्रो-प्रतिनिधि ने कहा कि उन्हें हर जगह दुत्कारा जाता है, पशुओं जैसा व्यवहार किया जाता है । दूसरी ओर हब्शियों के प्रति घृणा और उपेक्षा के बावजूद गोरी-युवतियों द्वारा उनसे विवाह के विवरण भी हैं ।यहूदी-समस्या पर वक्ताओं के दृष्टिकोण भी इस रिपोर्ट में हैं । लगभग पांच पेज की विस्तृत रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ण भेद का मूल कारण धर्म नहीं , सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक विषमता है ।

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्‌ ।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्‌ ।
यतोsभ्युदयनि:श्रेयस स सिद्धि: स धर्म: ।
धारयतीति धर्म: ।

सौजन्य से डॉ0श्री राजेन्द्र रंजन जी चतुर्वेदी

Dharma
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Dharma

The question of Dharma is basically a question of the relation between individual and society! The conflict between the individual and the society keeps ongoing and in this conflict, the basic element of Dharma also gets neglected again and again! The basic element of Dharma is coordination, harmony, and tolerance. In other words, Dharma is the process of inferring the permanence (truth, non-violence, and mercy, etc.) in a social movement. Society itself establishes Dharma by respecting modesty, Dedication, Generosity, Donation, imperfection, Truth, Love, non-violence, sincerity, parity, satisfaction, etc.

Geeta says,

अद्वेष्टा सर्वभूतानां = Do not be hostile towards any creature!
मैत्र: करुण एव च = Be friendly towards everyone and have compassion for the weaker! Just not to be hostile is not enough.
निर्ममो – निरहंकार: = Do not have selfishness, do not have any pride!
समदु:ख:सुखक्षमी= To hold a similar ability for both happiness and sadness
यस्मान्नोद्विजते लोको = so that the people do not have any disturbance.
लोकान्नोद्विजते च य: = He himself should not be upset with the world.
सम: शत्रौ च मित्रेषु तथा मानापमानयो: = Honor or humiliation, enemy or friend but with similar vision ~!

These qualities or sentiments show respect to the whole world..

सत्यान्नास्ति परो धर्म: ! अहिंसा परमोधर्म: ! परहित सरिस धरम नहि भाई !
Coordination is Dharma, Parity is Dharma, Justice is Dharma, Forgiveness is Dharma. Philanthropy is Dharma, truth is Dharma, Mercy is Dharma ! Imperfection is Dharma! Socialism is Dharma! Honesty is Dharma. Duty is Dharma! Love is dharma, Humility is Dharma, Gratitude is Dharma! Being selfless is Dharma! Humanity is Dharma! Upgrading Dharma by coordinating individual life and social life is Dharma!

In Shrimadbhagwat itself, when Narada narrates the character of Prahlada to Yudhishthira,
then,
Yudhishthira questions Narada that –
“O Devarshi! I want to know the Nature/Characteristics of Dharma.”

Narada then clarifies the characteristics of Dharma to Yudhishthira and says that –

“Dharma is truth, Dharma is mercy, Dharma is tenacity, Dharma is purity, Dharma is Tolerance, Dharma is the idea of fair and unjust, Dharma is restraint of mind and suppression of senses, Dharma is Ahimsa and Brahmacharya, Dharma is Sacrificing-Self-learning-Simplicity and Satisfaction, Dharma is to see everyone in the same way and behave in the same way, Dharma is to serve, Dharma is to overcome from indulgence/materialistic enjoyment, Dharma is Modesty, Dharma is Silence,
Dharma is Self-determination, Dharma is an appropriate division/sharing of basic necessities, including Food, among all,

Dharma is playing divinely/Godliness”

सीयराम मय सब जग जानी ! 🙏

भगवंछ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्म सनातनम्‌ । वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायण-मुखाच्छ्रुतम्‌ ।
सत्यं दया तपं शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:। अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्‌ !
संतोष: समदृक्सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै: । नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्‌ !
अन्नाद्यादे: संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत: ।तेष्वात्मदेवता बुद्धि:सुतरां नृषु पांडव: । भागवत ११ – ८-११

The sense of Dharma is the spirit of the society and it is a matter of understanding how Buddha awakens the society! Lord Buddha was at that time a monastery in Beluvan. A householder took a bath and saluted the six directions from north-south-east-west, up and down. When Lord Buddha asked him what this meant, he said that my father had preached to greet the six directions. Lord Buddha said that this is not Arya-Dharma. The householder said, then you teach me the Arya-Dharma to greet the six directions. Lord Buddha preached >> Parents are east-headed. Teacher is south. Wife and son are west-headed. Friends and partner are north-headed. The devotees and the workmen are downward and Brahman and Shramana are upward. It is the Arya Dharma to fulfill your obligation towards them by greeting to the six directions.

Buddha repeatedly said that >>
चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय ,लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं । देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मंझे कल्याणं- परियोसान कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ। [महावग्ग: : विनयपिटक]

Monks, keep traveling constantly to make people happy for the sake of many, for the benefit of many. For the middle and end stages, keep on illuminating the welfare and behavior of dharma. “

परस्परोपग्रहो जीवानां proclaimed by Mahavir Vardhaman, is a very important chapter in the history of India! Tirthankar Mahavir influenced folk life to a great extent, also gave direction to history! Certainly his movement was for the upliftment of the people.

Mahavira Vardhaman had contemplated to free humans from slavery, from bondage, from abnormality, from ignorance, from rudeness and from injustice. दश- लक्षण was respected. Did he worship Arhan, saint, teacher, Upadhyaya and universality? Mahavir left the Palace. He toured India for twelve years. He beared cold-hot-rain everything. Duijant – be it ashram, be it Chirakagram, be a Shanmani village, what a disgrace! What a disdain! Knocked wood pieces in the ears? But Mahavira made life a lab of truth. The center of his thinking was not a script, the whole of humanity was. अहिंसा परमो धर्म : या परस्परोपग्रहो जीवानां!!
Not only human beings, but the concern of the living beings. The importance of this thinking stream is undeniable in the background of Vaishnava-Chintan.

Mahatma Gandhi started the freedom movements on the basis of Dharma! In the freedom movement Gandhiji took the people with him, non-violent insistence of truth, civil disobedience. The source of trust between Bapu and the public was >>> truth. If the soul of democracy is public consciousness, then the soul of the Constitution of India is >> truth. If we separate >>> Satyameva Jayate <<<<< from the constitution, then the constitution will be proved otherwise.

Whatever be the ideology or any Dharma, no matter how humanitarian. It is not surprising to find that defect over time. After all, it is the man who has brought that idea or Dharma to life. The best idea gets spoiled by intentions. Buddhist thinking started one day by leaving the woman but finally got absorbed in the embrace of the woman. The proof is>>> the book named तथागत-गुह्यक<<<

The cover of Dharma is self-destruct to deceive the selfless people! The slogan of Dharma is given. The Dharma is invoked with the slogan and hence, terror is spread! The symbols of Dharma are situated. Misconceptions are formulated. They are encouraged. Rigidity is enhanced. :::: The conflict between individual and society comes as a conflict between dharma and religous institutions! Dharma and religious institutions are different. Religious institutions establishes itself as a dharma. “The truth is preaching the unrighteous Dharma! Dishonesty is writing the language of honesty! It is necessary to know the difference between Dharma and system of Dharma or Dharma and religious-institution!
They have many differences. Look at any scripture of the world! How can the Pope who lives in palaces among the splendor be a representative of Jesus Christ? Can the general Mullah be considered a spokesman for Muhammad’s conscience? Is the scripture like Guru Nanak or Guru Teg Bahadur or Guru Govind Singh? Can a common Jain-saint be considered Mahavir Vardhaman? Can Mahasthavira be called Mahatma-Buddha? Is the Shankara-Peetha Mahanta a statue of Adishankaracharya? Difference between Jesus and Pope, Difference between Buddha and Mahasthavira, Difference between Mahavira and Muni, Difference between Muhammad Shah and Mulla, Difference between Guru Nanak and Granthi, Difference between Mahant of Kabir and Kabiram, Difference between Adishakaracharya and Peeth Mahantha is the difference between dharma and system of dharma. There is one religion and another is religious institution?

In this duality of the individual and the society, when the individual gets organized selflessly, then he creates confusion to deceive people!

अधर्मे धर्मविभ्रम :!
Confusion of Adharma in Dharma!
The reason for this is hypocrisy! Hypocrisy bears all the bosom of religion! The Gita [16 – 32] also said that the intellect, which is coated with greed, sovereignty, pride, lust, anger, enlightened by mother’s disciples knows and recognizes Unrighteousness as Dharma. All the meanings of life are contrary to him because it is not possible for him to identify the truth due to greed etc.

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी ।

The collective interest is the strength of the poor!

सुने री मेरे निरबल के बल राम !

The name of the force of the weak is Rama, and the name of the force of the weak is Dharma !! Deendayalu, Deenabandhu, Deenanath, Patitpavan, Garibnavaj, Nath of the orphans. Why was he not called Amirbandhu? Dharma, God and faith are basically not the strength of the weak, it is the land of the weak and the force of the weak, which the occupants have seized upon the opportunity, in the same way as the land-mafia occupy the land. So the question is to get the land of the weak again.

Many of my friends believe that religion only causes discord and war, Dharma is unnecessary, Dharma is a tool for exploitation of oppression and to divert and many more things they say. On the other hand there are people whose Dharma is the basis of politics. They mobilize and divide people on the basis of Dharma. In the third category are those who believe that Dharma is the creation of particular characters which has forced it on the poor people. Is Dharma a spontaneous organization of weak people? Does dharma assure the weak? Or does your word degrade? Is human being an intelligent creature and carrying this unnecessary tradition in vain? On the other hand, should those friends also recognize that is it either dharma or adharma to cheat and deprive these weak people, those who dissolve poison in their food and adulterate food, those who exploit their labor, the doctors who deny them treatment, deprive them of education, their lands are smuggled, those who are smugglers, mafia, rapists, even if they hold the same idea of their dharma. Dharma considers devotion as a blasphemy and says

  • धर्मध्वजानां मुंडीनां वृत्यर्थं इति मे मति :
  • वित्त-शौचं हि शुचिता न मृद्वारि शुचि: शुचि : ।

How often you rub the body with mud and how often you bathe does not prove your purity. Is your holiness proved by how you have made money? Is dharma decided by how holy is your source of wealth? If you have stolen tax, taken away public money of the bank, then dharma is only a boon for you, which is covered >> a robber in a saints garb whose saints have blasphemed.

Religious icons are not Dharma but they are symbols of Dharma! Dharma is an element of conduct and behavior! Temple-mosque is not dharma but are features of dharma. There are also those who rarely go to the temple or mosque or if they worship or not or they may or may not be in any surrounding of dharma but they run to help others. They also worry about animals and birds. They also feel happy to see the children, make the blind or the disabled cross the road and help the elderly.

At some time the church had become the center of this hypocrisy, thoughtful people recognized it and refuted its myths! Be it Jesus, be Muhammad Sahib, be Buddha and Mahavira, be Shankaracharya, be Gorakh and Kabir, be Nanak, be Ramakrishna Paramahansa and Vivekananda, be Dayanand all have faced hypocrisy and demolished it!

Dharma is moral truth, it awakens the obligation towards man and other beings and nature, which draws lines between man and man, that is not dharma but is politics!

Vishal Bharat, an article published in the March 1980 issue caught my attention, this article is about, in fact it is a report written by Professor Benjamin E Mage of Harvard University. In the city of Amsterdam, a few years before the World War, there was a world conference on Christianity, in which Christian representatives from different parts of the world attended. Many topics were discussed, but Professor Benjamin E Mage has written this report focusing on apartheid in Christianity. Bantu of South Africa, Mavri of New Zealand, Red-Indian, Malaya, New Christian of Scandinavia, Negro of America and Judaic of Europe expressed their agony. The representative of the Gold Coast said that governments differentiate between white and black Christians so much that the schools and churches are different for both classes. The negro representative of America said that they are abused everywhere, treated like animals. On the other hand, despite the hatred and neglect of the Habshis, there are also descriptions of white women marrying them. Speakers’ perspectives on the Jewish problem are also in this report. A detailed five-page report has stated that the root cause of varna is not religion, but socio-economic-political inequality.

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम्‌ ।
आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्‌ ।
यतोsभ्युदयनि:श्रेयस स सिद्धि: स धर्म: ।
धारयतीति धर्म: ।

– Courtesy by Dr. Rajendra Ranjan Ji Chaturvedi

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