‘ॐ गं गणपतये नमः’

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अनेक नामों से पूजे जाने वाले देवों में प्रथम-पूज्य श्रीगणेश का भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को प्राकट्य हुआ, ऐसी लोक-मान्यता है।

प्राकट्य की प्रचलित कथा इस प्रकार है कि माता पार्वती स्नान के लिये जा रही थीं, सोचा कोई भवन में प्रवेश ना कर जाये इस हेतु एक माटी का बाल-स्वरूप पुतला बनाया और उसमें प्राण फूंक कर आज्ञा दी कि स्नानागार में किसी को भी मत आने देना। माता की आज्ञा पा प्रवेश द्वार पर डटे प्रतिज्ञारत सुपुत्र को क्या पता था कि स्वयं गौरापति शिव-संभु ही पधार जायेंगे । सदाशिव ने भवन में प्रवेश का प्रयास किया तो गौरीनन्दन ने प्रतिरोध किया। शिव रुष्ट हो गये और युद्ध छिड़ गया। गौरीनन्दन भी भिड़ गये, संसार अचरज में कि शिव-संभु का प्रतिरोध करने वाला यह वीर बालक कौन है? क्रुद्ध हो शिव बालक का सिर धड़ से अलग कर भवन में प्रवेश कर गये। गौरा ने पूछा, आपने प्रवेश करते वक्त किसी बालक को देखा, तो शिव ने कहा हां मिला था और मेरे भवन में प्रवेश करने का अवरोध बनने पर मैंने उसका वध कर दिया। यह सुन गौरा-पार्वती विचलित हो गईं और विलाप करते हुए प्रलय का संकल्प करने को तत्पर हो गईं । परेशानी समझ वहां ब्रह्मा-विष्णु आदि अन्य देवता एकत्र हो गये। शिव भी असमंजस में थे। शिव की प्रार्थना पर विष्णु जी ने एक हाथी का सिर ला दिया और सदा-शिव ने उसे मृत बालक के सर पर स्थापित कर दिया। बालक जी उठा और गौरा-पार्वती प्रसन्न हो गईं । आशीर्वाद स्वरूप हर देवता ने उस गजानन को अपना प्रथम-पूज्य मान कर गणाधिपति के रूप में स्वीकार कर लिया। वही गण-नायक, गणपति, गणेश सभी देवों में प्रथम-पूज्य हो गये।

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इस दिन को ‘कलंकी-चौथ या पत्थर-चौथ‘ भी कहते हैं । इसकी भी लोक-प्रचलित कथा है कि एक बार कैलाश पर्वत पर गौरी व शिव-संभु ने अपने पुत्र श्रीगणेश का इस दिन प्राकट्य दिवस का उत्सव मनाने के लिये सभी देवों व देवियों को आमंत्रित किया । सभी पधारे। चंद्रमा भी। अपनी सुन्दरता के घमंड में चूर चंद्रमा गणेश जी के रूप को देख कर उन्हें अपमानित करता हुआ हंसने लगा। हाथी का सिर, बड़े-बड़े कान, छोटी आंखें, लम्बी सूंड़, मोटा पेट,,, अपनी सुन्दरता के मद में चूर चन्द्रमा गणेश जी को जान ना पाया और अपमान कर बैठा। गौरा को सहन ना हुआ और चंद्रमा को काला होने का श्राप दे दिया और कहा कि जो तुझे देखे वो भी कलंकित हो जाये। अब तो चन्द्रमा के होश उड़ गए, चरणों में पड़ अपराध-बोध हो क्षमायाचना की। गौरा ने क्षमा करते हुए चन्द्रमा को मास में एक ही दिन पूर्ण स्वरूप में दिखने व शनैः शनैः हर दिन थोड़ा-थोड़ा काला होता रहे व एक दिन पूर्ण काला हो, और फिर हर दिन थोड़ा-थोड़ा अपने सुन्दर स्वरूप में आने का वरदान दिया। चन्द्रमा के पूर्ण स्वरूप को हम पूर्णिमा के दिन देखते हैं व थोड़ा-थोड़ा काला होकर अमावस को छुप जाता है और फिर शनैः शनैः अपने पूर्ण रूप को प्राप्त कर लेता है। साथ ही गौरा ने चन्द्रमा के दर्शन पर कलंकित होने वाली बात को भी इसी दिन के लिए सीमित कर दिया। तभी से इस दिन चन्द्रमा के दर्शन का निषेध है। और दर्शन करने पर कलंक लगता है, ऐसी मान्यता है।कहते हैं, श्रीकृष्ण ने भी इस दिन चन्द्रमा के दर्शन कर लिये थे और उनपर स्यमंतक-मणी की चोरी का कलंक लगा, जिसके लिये उन्हें जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा और स्यमंतक मणी को वापस लौटा कर अपना कलंक मिटाया। तभी से यह दिन कलंकी-चौथ के नाम से प्रसिद्ध हो गई। इस दिन दूसरे की छत पर पत्थर फेंकने का भी प्रचलन है, इसलिए इसे पत्थर-चौथ भी कहते हैं ।

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इस दिन श्रीगणेश की मिट्टी की प्रतिमा को घरों में स्थापित किया जाता है व अनन्त-चतुर्दशी तक, दस दिन तक पूजन किया जाता है व अनन्त-चतुर्दशी के दिन इस प्रतिमा का बहते जल में, नदी या सागर में विसर्जन किया जाता है। यह श्रीगणेशोत्सव पर्व महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में प्रसिद्ध स्वतंत्रता-सेनानी श्री गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा लोगों को इकट्ठा करने के उद्देश्य से शुरू किया गया व आज भी धूम-धाम से मनाया जाता है ।

श्रीगणेश को बेसन के लड्डू व मोदक पसंद हैं । डिंक नामक चूहा-मूषक उनका वाहन है। उनका स्वरूप जैसा हम जानते हैं कि गज, हाथी का सिर है, मोटा पेट, चार हाथ, हाथों में पाश, अंकुश, मोदक व वर मुद्रा होती है, कहीं कहीं एक हाथ में नींबू रखते हैं। उनके दो दांत, एक पूरा एक टूटा। टूटे हुए दांत की कथा भगवान परशुराम से है, जिनके साथ श्रीगणेश के साथ युद्ध में परशु के प्रहार से खंडित होना बताया जाता है।

श्रीगणेश की दो पत्नी, ऋद्धि व सिद्धि व दो पुत्र शुभ व लाभ हैं ।

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श्रीगणेश के कुछ प्रसिद्ध स्तुति-श्लोक इस प्रकार हैं-

वक्रतुंड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ:। निर्विघ्नं कुरु मे देव शुभ कार्येषु सर्वदा ॥
 
नमामि देवं सकलार्थदं तं सुवर्णवर्णं भुजगोपवीतम्ं। गजाननं भास्करमेकदन्तं लम्बोदरं वारिभावसनं च॥

एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम्ं। विध्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम्॥

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं। नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारु भक्षणम्ं। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षकं। भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात्॥

केयूरिणं हारकिरीटजुष्टं चतुर्भुजं पाशवराभयानिं। सृणिं वहन्तं गणपं त्रिनेत्रं सचामरस्त्रीयुगलेन युक्तम्॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावासं स्मरेन्नित्यम् आयुःकामार्थसिद्धये  ॥

सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ।धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि । विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।।शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ।। मूषिकवाहन् मोदकहस्त चामरकर्ण विलम्बित सूत्र । वामनरूप महेश्वरपुत्र विघ्नविनायक पाद नमस्ते ॥

ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणाम् ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिःसीदसादनम्ॐ महागणाधिपतये नमः ॥

ॐ   तत्पुरुषाय   विद्महे वक्रतुण्डाय   धीमहि   ।तन्नो   दन्ती   प्रचोदयात्   ॥

अगजानन पद्मार्कं गजाननं अहर्निशम् । अनेकदंतं भक्तानां एकदन्तं उपास्महे ॥

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।। ॐ श्रीगणेशाय नमः ।।

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